Monday, 6 February 2012

आम आदमी

मैं आम आदमी हु,
मैं भी इस देश में रहता हु,
महगाई की मार, या हो किसी का
अत्याचार, उसकी पीड़ा
मैं ही सहता हु,

रोज़ कमाता हु रोज़ खाता हु,
और जिस दिन नहीं मिलता काम,
उस दिन खाने की राम राम,
न लुट जाने की चिंता, न खो जाने का गम,
मुझे भगवान पे भरोसा है, वही
मेरी चिंता ले के है सोता ,

कभी कभी मेरा भी मन
खास आदमी बनने का होता है,
मैंने सुना है,
लेकिन खास आदमी तो
झूठे, मक्कारों और धोखेबाजों के
साथ सोता है,

खास आदमी का खाना भी खास होता है,
उसके खाने में भूसा, बोफोर्स तोप और
स्पेक्ट्रुम होता है,
इतना खाने के बाद भी उसका पेट है खाली,
हर गरीब से छिनना चाहता है उसकी थाली,

कब इसका अत्याचार रुकेगा, जाने कब तक
ये सत्ता की कुर्सी पे बैठ कर
देश और देश की अबलाओं का चीरहरण करेगा,

ये मर जाये तो सेकड़ों एकड़ में दफनाया जाता है,
और आम आदमी को जिन्दा रहने पर भी
एक घर नहीं मिल पाता है,

इसकी इज्ज़त न बेईज्ज़ती होती है,
इसकी सेवा कभी जूतों, चप्पलों और
थप्पड़ों से होती है,

इसका न कोई धर्म और भगवान है,
इसका धर्म के नाम पर
आम आदमी को लूटना और लडवाना ईमान है,

मैं तो आम आदमी ही ठीक हु,
प्यार, इमानदारी ही मेरा गहना है,
मैं आम आदमी हु, और
आम आदमी मुझे रहना है,

   ***********राघव विवेक पंडित 


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