Tuesday, 7 February 2012

शून्य

मैं भी कभी हरा हरा था
फूल पत्तों से भरा था
मेरे अपनों ने पहले
नाता तोडा,
जर्द पत्तों और साखों ने
दामन छोड़ा,
आज में निर्बल और
मजबूर हु,

एक दिन जर्जर होकर
इस मिटटी में मिल जाऊंगा,
शून्य से आया था शून्य हो जाऊंगा,

तेरी जवानी भी एक पल का
शोर है, फिर अँधेरा घोर है,

जैसे जैसे तेरा योवन जायेगा
हर तेरा अपना तुझ से
दामन बचाएगा,

फिर तू एक दिन सबसे
नाता तोड़ जायेगा,
तेरा अस्तित्व शून्य से आया था
शून्य हो जायेगा,

परमात्मा की
यही नियति यही दस्तूर है,
इस मंजर को देखने को
हर कोई मजबूर है,





******राघव विवेक पंडित 

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