Sunday, 22 July 2012

मजबूर हम


घुटने लगता है दम
साँसे तेज हो जाती है
होठ खुलते है
चिल्लाने को
मगर जुबान
साथ नहीं देती,
मन रोता है
आँखें भर आती है
लेकिन आवाज़ नहीं आती,
ह्रदय कोसता है
कभी विधाता को
कभी जीवन को,

जब मजबूर
कर दिया जाता है ऐसे
कार्यों को करने के लिए,
जिन्हें करने के बाद
हमारी अंतरात्मा
धिक्कारती है,
लगाईं जाती है
जब हमारी
ईमानदारी की बोली
झूठे और मक्कार
लोगों के द्वारा,
जब बन जाते है हमारे लिए
विरोध और मौत
पार्यवाची शब्द,



*******राघव विवेक पंडित

Tuesday, 17 July 2012



सिमट गया 
सब कुछ कागज के 
एक टुकड़े पर, 
उस टुकड़े को कोई
डालर तो कोई रुपया
कहता है,
चारों पहर इंसान 
उसी के फेर में रहता है,

इंसान की सभी
भावनाओं, रिश्तों और
क्रियाकलापों का 
केंद्र बिंदु बन गया है 
कागज़ का एक टुकड़ा,

गूंगे और बहरे
हो जाते है उसे देख
बड़े बड़े भाषण देने वाले,

बदल जाते है
सच और झूठ के मायने
कागज़ के
एक टुकड़े के दखल से,
सर्वोपरि हो गया 
वो इंसान के
सभी संस्कारों से,

जिस कागज़ के टुकड़े का 
अविष्कार
इंसान ने किया,
आज वही
कागज़ का टुकड़ा 
इंसान को चला रहा है,


        *******राघव विवेक पंडित 











Saturday, 14 July 2012


सिर्फ हमारा

बड़ी ख्वाइश होती है
कभी झूमे
ये दिल भी हमारा, 
कोई स्नेह से चूमे जो 
माथा हमारा,

कोई हमें भी भर ले
प्यार से बाहों में,
प्यार हो हमारे लिए भी  
किसी की निगाहों में,

कोई पूछे हम से भी 
हमारे दिल का हाल,
काश कोई रखता
हमारा भी ख्याल, 

कोई लिखता हमें भी 
प्रेम भरी पाती,
कोई होता हमारे भी
दुःख सुख का साथी,

कोई होता जिससे हम अपना 
दुःख सुख बतियाते ,
कोई होता जिसके दुःख में 
हम आंसू बहाते,

कोई होता जिसके बिछुड़ने पर 
दिल फूट फूट रोता,
कोई होता जो सिर्फ हमारा
सिर्फ हमारा ..... सिर्फ हमारा होता,


                 *******राघव विवेक पंडित 




Saturday, 7 July 2012


मैं स्वयं से
यूँ ही कब तक लडूं,
कशमकश सी
रहती है मन में
कुछ कहने न कहने की,

कब तक
न दूँ अंतर्मन में
उठने वाले सवालों के जवाब,
कब तक सच से मुख मोड़
झूठे और बनावटी
संसार से मन बहलाऊं,

कैसे रोकूँ
अंतर्मन में उठने वाले
उन सवालों को
जिनके जवाब देते हुए
मैं उग्र हो जाता हूँ


जो अहसास दिलाते है मुझे
मेरी मृत संवेदनाओं का,
झकझोर देते है मेरी
अंतरात्मा को,


*******राघव विवेक पंडित




सावन की
रिम झिम से
घर में बैठा कोई
राहत की सांस ले
परमात्मा का
धन्यवाद कर रहा है,


और एक तरफ
एक औरत
अपने बच्चों के साथ
जिसका बसेरा
खुला आसमां
दुकानों का छज्जा
भीग रही है
झमाझम पानी में
भीग के ठिठुरती
ठंड से कांपते
अपने बच्चों को
एक कई जगह से फटी
चादर से ढकती,
ठंड से बचाने की
नाकाम कोशिश करती हुई
कभी आसमां की ओर
देखती है तो
कभी बच्चों की ओर,
बहुत मुश्किल है उसकी
तड़प को समझना,


*******राघव विवेक पंडित




उम्र गुजार दी 
सामान इकठ्ठा करने में 
जीने का,
अब मिला है वक़्त
तो खुद को
तलाशता हूँ 
मैं सामान के बीच,

मैं नासमझ 
ये न समझ पाया 
बीती जिन्दगी और साँसे 
किसी बाजार में 
नहीं मिलती,

आज वो वक़्त है 
सामान है दो जन्मों का,
और मैं तड़पता हूँ 
दो दिन जीने को, 
 

               *******राघव विवेक पंडित 
 

Tuesday, 3 July 2012

अब तो 


दुनिया में जीने को चाहिए

दिल पत्थर का,

वो लायें कहाँ से यारों, 

या रहे तन्हा

या पथरों से दिल लगाए यारों,


हम न होंगे पत्थर 

न पत्थर दिल बनेगे यारों,

यूँ ही मोम सा दिल लिए 

हम पथरों से लड़ेंगे यारों,



होंगे जो पत्थर दिल 

वही चौराहों पे बिकेंगे यारों,

सदा रहे दिलवाले

सबके दिल में,

मर के भी 

दिलों में ही रहेंगे यारों,


लाख जुल्म करे जमाना 
हम न बदलेंगे यारों, 
हम है इन्सां 
इन्सां ही रहेंगे यारों,
 


          *******राघव विवेक पंडित




Monday, 2 July 2012


माँ ने
आँखों में आंसू भर
बेटे को 
शहर के लिए
विदा तो किया,

लेकिन आज भी
माँ की आँखों मे
विदाई के समय की
नमी बाकी है

आज भी
घर के द्वार के
उसी कोने पर
शाम को
उसके आने का
करती है इंतज़ार,
जहां से उसने
अपने बेटे को
जी भर देख
विदा करने का
साहस किया था,


     *******राघव विवेक पंडित


रुठुं तो किससे
कोई अपना सा 
लगा ही नहीं 
किसी न 
अपना कहा ही नहीं,

जो मिला स्वार्थ से
स्वार्थ पूर्ण होते ही
वो हो गया विलुप्त,
जैसे संसार से
डायनासौर,

लेकिन ये लौटेगा फिर
किसी स्वार्थ से
मिन्नते करता
माफ़ी मांगता
और स्वार्थ पूर्ति
के पश्चात
फिर गायब,

और बढ़ा गया
मेरे जीवन में एक और
स्वार्थी मित्र की संख्या,

******राघव विवेक पं
डित
बचपन से ही 
स्वयं के सिवाय 
सबके लिए 
सोचता था वो,

माँ बाप घर द्वार
कब छूटे
उसे नहीं पता
उसे पता था सिर्फ
गाँव के लोगों की समस्या और
उनके दुःख दर्द,
गाँव के सभी लोगों के
दिल में
रहता था वो,
गाँव के बहुत से लोग
उसका नाम तक नहीं जानते थे,
गाँव के बड़े बुगुर्ग उसे
बेटा
और गाँव के बच्चे
भैया
कह बुलाते थे,

एक बार कहीं
दूर गाँव में
तूफान से
सारा गाँव बिखर गया
बर्बाद हो गए लोग
चारों ओर हा हाकर,

उसने सुना
बिना कुछ सोचे विचारे
वो आतुर हो उठा
वहां जाने को,
गाँव वालों ने
उसे बहुत मना किया
पर वो अपने निर्णय पर
अडिग रहा,
लोगों ने उसे भारी मन से
विदा किया,

किसी ने बताया
उसने वहां भी
पीड़ितों की बहुत
सेवा की,
वहां भी न जनता था
उसका कोई नाम,

वहां भी लोगों में उनका
बेटा और भैया
बन के रहा वो,
बहुत समय तक
उसकी फिर
कोई खबर न आई,

फिर एक दिन
खबर आई कि
बाढ़ के पानी में
डूबते एक बच्चे को बचाते समय
वो स्वयं भी डूब गया,

लौटा न वो
फिर कभी
वो मिटाता चला
अपने क़दमों के निशाँ
नहीं चाहता था वो
अपनी कुबानी के बदले
कुछ भी,.

लेकिन वो
छोड़ गया लोगों के
ह्रदय में एक अमिट छाप,

*******राघव विवेक पंडित
क्यों कोई आता है याद,
कुछ मरहमी 
बातें करने के बाद,

क्यों उसकी की कमी सी 
महसूस होती है,
उसे देखने की बार बार
ख्वाइश होती है,

वो अनजाना
अनदेखा
अपना सा लगने लगता है,
उसका अपनापन
मजबूर कर देता है
आँखों में आंसू होने
के बाद भी
मुश्कुराने को,

जब भी कोई दिल को
ठेस पहुंचता है
बहुत याद आती है उसकी,
दिल चाहकर भी
उसे भुला नहीं पाता,

*******राघव विवेक पंडित

क्यों खुमारी सी
तुझ पे 
मजहब की
छाई रहती है, 
क्यों तुझे
इंसानियत की बात 
न सुनाई देती है, 
क्यों उलझी
रहती है तू 
हजारों साल पुरानी किताबों में,
उनमे कहाँ 
आज की
तस्वीर दिखाई देती है,

बचपन से ही
तुने निर्दोष
जीव और इंसानों का
खून बहते देखा है,
तू कितना भी धोये 
मैंने आज भी
तेरी बातों और हाथों में 
लहू देखा है,

कितना भी मुहब्बत का 
नाम तेरी
जुबान पे सही,
बगल में तेरे सदा
लहू सना
खंजर रहता है,

तू कितना भी
खुद को
समाज में फैली 
बुराइयों का
आलोचक कह,
तेरी बातों में
कहीं न कहीं 
मजहब प्रेम रहता है,

          ********राघव विवेक पंडित 

क्यों भाग रहा है  
पता नहीं,
अनगिनित चीख और चिलाहट
सुनने के बाद भी
नहीं जाग रहा है, 
अँधा हो गया है,
स्वार्थ में 
बहरा हो गया, 
लालच में 
खबर नहीं
खुद की भी 
ठोकर लगने पर गिरता है
फिर संभलता है, 

फिर लगा भागने 
पर किस ओर
मालूम नहीं,

ह्रदय है खाली
सिर्फ एक
मांस का टुकड़ा,
कब संवेदनाओं ने
दम तोडा 
पता नहीं,
कब इंसान से मशीन बना
पता नहीं  
बन गया है,
चलता फिरता मांस का टुकड़ा
बस चलता जा रहा है ... चलता जा रहा है 
कहाँ 
पता नहीं ...........
आज का इंसान, 

          *******राघव विवेक पंडित