Saturday, 7 July 2012


सावन की
रिम झिम से
घर में बैठा कोई
राहत की सांस ले
परमात्मा का
धन्यवाद कर रहा है,


और एक तरफ
एक औरत
अपने बच्चों के साथ
जिसका बसेरा
खुला आसमां
दुकानों का छज्जा
भीग रही है
झमाझम पानी में
भीग के ठिठुरती
ठंड से कांपते
अपने बच्चों को
एक कई जगह से फटी
चादर से ढकती,
ठंड से बचाने की
नाकाम कोशिश करती हुई
कभी आसमां की ओर
देखती है तो
कभी बच्चों की ओर,
बहुत मुश्किल है उसकी
तड़प को समझना,


*******राघव विवेक पंडित



1 comment:

  1. एक ख़ुशी का अनुभूति कराती है और दूसरी बहुत मर्मस्पर्शी है...बरसात के दो रंग है ये...

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