Saturday, 7 July 2012


मैं स्वयं से
यूँ ही कब तक लडूं,
कशमकश सी
रहती है मन में
कुछ कहने न कहने की,

कब तक
न दूँ अंतर्मन में
उठने वाले सवालों के जवाब,
कब तक सच से मुख मोड़
झूठे और बनावटी
संसार से मन बहलाऊं,

कैसे रोकूँ
अंतर्मन में उठने वाले
उन सवालों को
जिनके जवाब देते हुए
मैं उग्र हो जाता हूँ


जो अहसास दिलाते है मुझे
मेरी मृत संवेदनाओं का,
झकझोर देते है मेरी
अंतरात्मा को,


*******राघव विवेक पंडित



1 comment:

  1. उहापोस में उलझी
    गहन भाव लिए रचना...
    :-)

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