Sunday, 22 July 2012

मजबूर हम


घुटने लगता है दम
साँसे तेज हो जाती है
होठ खुलते है
चिल्लाने को
मगर जुबान
साथ नहीं देती,
मन रोता है
आँखें भर आती है
लेकिन आवाज़ नहीं आती,
ह्रदय कोसता है
कभी विधाता को
कभी जीवन को,

जब मजबूर
कर दिया जाता है ऐसे
कार्यों को करने के लिए,
जिन्हें करने के बाद
हमारी अंतरात्मा
धिक्कारती है,
लगाईं जाती है
जब हमारी
ईमानदारी की बोली
झूठे और मक्कार
लोगों के द्वारा,
जब बन जाते है हमारे लिए
विरोध और मौत
पार्यवाची शब्द,



*******राघव विवेक पंडित

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