Monday, 6 February 2012

अजनबी दोस्त


अजनि ब्यों से दोस्ती की है
अपनों  का गम भुलाने के लिए ,
 देखते क्या मिलता है 
अब उन से दिल लगाने के लिए,

 अगर दर्द मिला ,
तो उसकी हमको आदत है,
 अगर जखम मिला
तो उसको भी हम अपना लेंगे
 यही है किश्मत ,
ये कह के मन को सम्झा लेंगे ,

हमें तो आदत है,
मन को समझाने की,
बीत जायेगा ये वक़्त भी,
ये कह कर भूल जाने की,

 अगर ख़ुशी मिली तो समझ जायेंगे ,
 कि आदत डाल ले दीवाने
अब मुश्कुराने की,
 लगता है कि नज़र बदल गई ज़माने की,
रहम आ गया
तुझ पे उपर वाले को,
 कभी हमारा दिन भी आएगा ,
ये सोच कर जीवन कट जायेगा,
इस उम्मीद के साथ
दीवाना खाक में मिल जायेगा,

***********राघव विवेक पंडित 

No comments:

Post a Comment