Monday, 6 February 2012

ये मेरी जिन्दगी

ये मेरी जिन्दगी
साँसों की घुटन और
जीने के लिए मजबूरी और बेबसी,

मौत भी नहीं आती है,
हर पल जिन्दगी किसी न किसी
की याद दिला के,
जीने के लिए मजबूर कर जाती है,

इंसानी रिश्तों का क़र्ज़,
अपने बड़ों और बच्चों के
प्रति मेरा फ़र्ज़,
इन्सान रूपी परमात्मा के
बनाये कुछ दस्तूर.
मुझे कर रहे है, जीने पे मजबूर,

ये है मेरे अंतर्मन की व्यथा,
बस अब ये सब है मेरे सखा,

शायद जिन्दगी इसी का नाम है,
कभी ख़ुशी और कभी गम में
गुजरती अपनी शाम है,





***********राघव विवेक पंडित 

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