Friday, 17 February 2012

समाज के कलंक


मैं जीता हूँ बेजमीरों में 
लालच में अंधे 
वो जो जीते है
सिर्फ अपने लिए,

रहते है शीशे के घरों में 
हो चुके पत्थर
मर चुकी है आत्मा
खाते है बेईमानी का
पीते है निर्दोषों का खून,

ये इंसान रूपी 
पिशाचों की वो जमात है
जो न भगवान और
न इंसान के साथ है,

पैसे के लिए 
ये कुछ भी बेच दें
ये माँ बाप बहन बीवी और 
देश बेच दें,

न कोई इनकी बहन
न भाई है, 
ये लाशों के सौदाई है
इन्होने आँखें, दिल और
किडनी बेच खाई है,

ये है मांस के सिर्फ चीथड़े 
इनका कोई नाम नहीं 
नहीं कह सकते
इन्हें जानवर भी,
क्योकि अच्छे होते है 
इनसे जानवर भी,
इनसे डरते है
जानवर भी, 

ये है मानव समाज
के कलंक
समय समय पर हमारी 
अंतरात्मा को झंझोड़ना 
काम है इनका,
इनके द्वारा किये कृत्य
हमें धिक्कारते है
हम कुछ नहीं कर सकते इनका
हम कितने मजबूर है या
हमें आदत हो गई है 
सहन की,
 
हम इस गंदगी को 
ढोयेंगे कब तक, 
ये नासूर है समाज में
जो लाइलाज है अब,
इसको काट फेकना ही 
इसका अंत है 


           *******राघव विवेक पंडित 




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