Wednesday, 1 February 2012

मासूम मुहब्बत

तेरे कुचे से अब भी तेरी महक आती है,

उसकी दरों दीवार न जाने क्यों,

मुझे देख सहम सी JATI है



पूछती है,

क्या छोड़ गया था जो लेने आया है,

अब वो न यहाँ है न उसका साया है,



तुझे याद करके वो अश्क बहाती थी,

रुसवा न हो मुहब्बत, इस ख्याल से सहम सी जाती थी,



अब यहाँ उसके अश्क और रुसवाई है,

जो तेरी बेवफा मुहब्बत ने करवाई है,



तू बेवफा है उसे ये इल्म न था,

जो न सहा उसने, ऐसा कोई सितम न था,



वो तुझे मुहब्बत का खुदा समझती थी,

इसी गफलत में, वो तुझसे मुहब्बत करती थी,



उसने मरने तक अपनी दहलीज़ नहीं छोड़ी,

क्योकि उसे तेरा इंतज़ार था,

उसका चेहरा अश्कों से सरोबार था,

उसकी आखरी साँसों पे बस तेरा ही नाम था,



उसकी पाक मुहब्बत का तू गुनाहगार है,

जा देख उसकी कब्र पे,

उसे तुझ से कितना प्यार था,

उसने अपने नाम के साथ लिखवाया तेरा नाम था,



उस मासूम पे तुझे, थोडा तो तरस आया होता,

दफ़न से पहले एक बार तो चेहरा दिखाया होता,



***********राघव पंडित


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