Monday, 6 February 2012

मेरी माँ


वो अलबेली है अजब पहेली है,
वो सबसे जुदा है उसमे खुदा है,

मृदुभाषी, सहनशील, सौन्दर्यवान है,
 पर उसे नहीं अभिमान है, 

वो ज्ञान का सागर है,सबको ज्ञान वो देती है,
 जाने किस मन मंथन मैं रहती है, 

वो शांत मन की स्वामिनी है,
पर उसके मन के शांत सागर मैं
कितने ही अशांत तूफ़ान है,

उसका फूलों सा सुंदर मन है,
होठों पे हंसी,
और मन मैं सेकड़ों काटों की चुभन हैं,

 दुनिया ने कितनी ही बार उसकी आत्मा को झंझोड़ दिया ,
 उसने सभी को माफ़ कर  दिया  और छोड़  दिया
यही बडडपन तो उसकी शान,
जो बनाती उसे महान है,

दुःख सह के , सब को सुख देती है,
तभी तो सब के मन मैं रहती है,

तप, त्याग ,धर्य, सहज, ये सब उसके गहने है,
उसकी आत्मा ने ये सब पहने है,

मैंने भी उसे नहीं देखा है,
 हाँ ख्यालों मैं खिची एक रेखा है,
उसकी सीरत से लगाया
ये अंदाज़ है,
 वो इस दुनिया से अलग
कुछ खास है,

 **********राघव विवेक पंडित 



No comments:

Post a Comment