Tuesday, 7 February 2012

लाशों का शहर

ये मेरे शहर जैसे घर में क्या हो रहा है,
हर इंसान अपना सकूँ खो रहा है,

लालच की उसके इन्तहा हो गई
भागते भागते
जिन्दगी कहाँ खो गई,

हर इंसान एक लाश नज़र
आता है हँसता खेलता शहर,
अब दफिनो नज़र आता है,





******राघव विवेक पंडित 

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