Tuesday, 7 February 2012

दिल कहता है,

दिल कहता है,
आ मुहब्बत तुझे जखम दिखा दू,
तेरे किये सितम के तुझे नक्स दिखा दू,

तुने जो दिया मुहब्बत में मुझको ,
आ तुझको उसकी तस्वीर दिखा दू,

तुने चाहा था बर्बादी मेरी,
आ उस बर्बादी के खंडहर दिखा दू,

मांगी थी मुहब्बत मैंने जिस बेरहम से,
आज सहमा सहमा सा हु में उसके सितमों कर्म से,

आ उस बेरहम का तुझे जलवा दिखा दू,
कैसे किया मुझे तार तार ये में बता दू,

मेरी हर एक रग से लहू बह रहा है,
तू बेदर्द, तू बेवफा ये कह रहा है,

आँखों से अश्क बार बार बह रहे है,
क्या यही है मुहब्बत, दुहाई दे रहे है,

आ मुहब्बत तुझ पे हजारों इलज़ाम लगा दू,
तू है बदनाम ये एलान करा दू,

मैंने सुना था मुहब्बत में सुकून मिलता है,
बहारों के बगैर भी फूल खिलता है,

शायद, राघव ये तेरी किस्मत है,
मुहब्बत ये तेरा दस्तूर नहीं,
मेरी बर्बादी में तेरा कोई कसूर नहीं,





******राघव विवेक पंडित 


No comments:

Post a Comment