Monday, 6 February 2012

बेचारा दिल

 हमारे तो ख्वाब, ख्वाब ही रह गए,
अरमान आंसुओं में बह गए,

जिसे दिल में बसाया था हमने कभी
वो अजनबी कहते है हमको अभी,

हमने जिनको समझा था अपना नसीब,
वो आज बैठे है गैरों के करीब,

हम उनसे प्यार करते है बे इन्तेहा,
पर उनके सितम की नहीं है इन्तेहा,

हमने भी बड़ा खुदगर्ज महबूब पाया है,
हमारी तकदीर पर सदा से बदनसीबी का साया है,

जाने क्यों हमें उन पे आज भी प्यार आता है,
नादान दिल उन्हें देख हाथों से निकला जाता है,

तेरे सितमो को, हम तेरी नादानिया समझते है,
यही सोच के ,
तो हम अब भी तुझ से प्यार करते है,

  ***********राघव विवेक पंडित 


No comments:

Post a Comment