Wednesday, 1 February 2012

उम्मीद

ठिठुरती ठण्ड में 
सुबह सुबह
मासूम सी
दो आँखें
रेड लाइट पर
रुकी गाड़ियों की
ओर
आगे बढती है
फिर रुक जाती है
.
आगे बढती है
फिर रुक जाती है

इस उम्मीद से
शायद गाडीवाला कुछ देगा
बहुत जोर से लगी
भूख मिटाने को खाना
या खाना खरीदने को
पैसा

कुछ देगा या नहीं
इसी असंजमस के हालात में
वो आगे नहीं बढ़ता
और ग्रीन लाइट हो जाती है
गाडी चली जाती है

ठिठुरती ठण्ड में
दो आँखें
फिर किसी गाडी के
इंतज़ार में

******* राघव विवेक ***

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