Monday, 13 February 2012

एक मौत का दिन


काश हर वर्ष में  
एक मौत का दिन होता,
इंसान तड़प तड़प के 
क्यों मौत के लिए रोता,

आँखे भी सालों साल न होती नम, 
न मौत के इंतज़ार में रोता गम ,

न जाने कितने जिन्दगी के मारों को 
मिलता सहारा,
जो रहे सदा तूफ़ान में, न मिला किनारा,

शायद
मर के ही इन ग़मों से जान छुट जाती,
पर साल का एक दिन भी नहीं, 
हम गम जदों का साथी,


                *********राघव विवेक पंडित**

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