Thursday, 9 February 2012

मैं गरीब मजदूर


मेरे सिर पर कपडा 
माथे पर पसीना 
पेट कभी आधा भरा
कभी खाली 
तन पर एक फटी लंगोटी 
पाँव में एक टूटी चप्पल
हाथों पर कुछ चोट के निशान
और कुछ जख्मों से बहता लहू 

मेरी पत्नी भी
मेरे कंधे से कन्धा मिलाकर
दो वक़्त की रोटी के लिए
संघर्षरत 

अपना घर 
एक ऐसा सपना
जिसे शायद मेरी कई पीड़ियाँ भी
साकार न कर सके

मेरा घर 
उस इमारत या घर की टूटी हुई 
चारदीवारी 
जिसे बनाने के लिए
मुझे मजदूरी पर रख्खा गया
 
मेरा बिस्तर
सीमेंट के खाली बोरे 
और ओढने को एक फटी लंगोटी या
किसी ने रहम कर के दी 
कोई पुरानी चादर 

चुनाव के समय 
मेरे गाँव का प्रधान 
गाँव आने का आमन्त्रण और
रेल का टिकट दोनों भेजता है,
और वोट डालने के बाद 
कहता है 
बाय बाय 
क्या यही मेरे जीवन का मूल्य है,
'एक वोटर'

सरकार भी बड़े बड़े वायदे करती है , 
बजट में भी हमारे जैसे लोगों के
कल्याण के नाम पर कुछ रखती है,

मेरे मरने और जीने से 
क्या फर्क पड़ता है,
पर बजट में मेरे कल्याण के
नाम पर निकाले पैसे से
नेताजी का खानदान ऐश करता है,

जिन मकानों को हम 
खून पसीना बहा के बनाते है, 
उसमे रहने वाले लोगों के द्वारा 
समाज की गंदगी कहे जाते है,

क्या मेरी यही पहचान है 
वोटर
समाज की गंदगी 
ओए इधर आ
इत्यादि 

मैं सोचता हूँ  
न जाने कब
मुझे इंसान समझा जायेगा,
क्या मेरे बच्चों को भी  
कोई इन्ही नामों से बुलाएगा,
ये सोचकर
मन बहुत दुखी होता है, 

अब तो
ये प्रतीत होता है 
मेरा गरीब होना है शायद पाप,
मेरा जीवन 
मेरे लिए और
इस समाज के लिए है शाप,


           *******राघव विवेक पंडित*** 

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