Friday, 10 February 2012

सच की पुकार


मैं सच 
चिल्लाता हूँ 
सुने कोई 

मैं सच
घायल तड़पता हूँ 
मरहम लगा दे कोई, 

मैं ईमान
कोडियों के भाव बिकता हूँ 
ले ले कोई

मैं ईमान
भूखा तडपता हूँ 
कुछ खिला दे कोई

कोई घर से बहार तो निकलो 
देखो तो एक बार,
क्या आज 
मेरा कोई साथी नहीं,
बचपन में तुमने मुझे 
अपनी किताबों में पढ़ा है,

तुम मेरी 
दिन में कई बार कसम लेते हो,
लेकिन जब मैं आता हूँ 
तो तुम मुझे  
झूठ और बेईमानी के 
पाँव तले
रोंद देते हो,

तुम मुझसे लाख बचों 
झूठ और बेईमान के
साथ सौ षड्यंत्र रचों ,
तुम मुझे न भुला पाओगे,
जब भी देखोगे आइना
खुद से भी नज़र बचाओगे 


          ******राघव विवेक पंडित****

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