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Friday, 24 August 2012


हर सुबह क्यों इंतज़ार है तेरा
तेरे दीदार पर नहीं हक़ मेरा,

तू रानी है गुलिस्तान की
मेरा वीरानो में है डेरा,

मैंने तुझे देखने की गुस्ताखी की
क्या करूँ इस दिल पे नहीं बस मेरा,

तू समंदर है मुहब्बत का
क्या एक कतरे पर भी नहीं हक मेरा,

*******राघव विवेक पंडित