हर सुबह क्यों इंतज़ार है तेरा
तेरे दीदार पर नहीं हक़ मेरा,
तू रानी है गुलिस्तान की
मेरा वीरानो में है डेरा,
मैंने तुझे देखने की गुस्ताखी की
क्या करूँ इस दिल पे नहीं बस मेरा,
तू समंदर है मुहब्बत का
क्या एक कतरे पर भी नहीं हक मेरा,
*******राघव विवेक पंडित