मैं गाँव से चला कुछ
ख्वाब सजाये
वो दरिया
वो पनघट
वो बस्ती
शहर ने सभी भुलाए,
कहाँ से चला
कहाँ आ गया मैं,
दर दर भटकता
चला जा रहा मैं,
खुद से ही खुद का पता
पूछता हूँ,
वो दरिया, वो पनघट,
वो नीम की ठंडी हवा
पूछता हूँ,
भटकते भटकते
कहाँ आ गया मैं,
गाँव को अपने देख
घबरा गया मैं,
चारों तरफ अँधेरा
और सन्नाटा,
अब गाँव में लोग नहीं,
रहते है खंडहर
मुझे देख खंडहरों से
आवाज़ आई
क्या तू शहर से आया है
तू ही बता
जो शहर गए थे क्या
वो आयेंगे
या हम इंतज़ार में
यू ही बिखर जायेंगे,
उनके इंतज़ार में
माँ बाप के
आंसू ही सुख गए,
आँखे पथरा गई
प्राण ही रूठ गए,
उन्हें कैसे बताऊँ
शहर के पत्थर के जंगल में
मैं खुद पत्थर हो गया,
मुझसे उस जंगल में
जो गाँव से गया था मेरे साथ
वो इंसान कहीं खो गया,
*******राघव विवेक पंडित
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