Tuesday, 3 July 2012

अब तो 


दुनिया में जीने को चाहिए

दिल पत्थर का,

वो लायें कहाँ से यारों, 

या रहे तन्हा

या पथरों से दिल लगाए यारों,


हम न होंगे पत्थर 

न पत्थर दिल बनेगे यारों,

यूँ ही मोम सा दिल लिए 

हम पथरों से लड़ेंगे यारों,



होंगे जो पत्थर दिल 

वही चौराहों पे बिकेंगे यारों,

सदा रहे दिलवाले

सबके दिल में,

मर के भी 

दिलों में ही रहेंगे यारों,


लाख जुल्म करे जमाना 
हम न बदलेंगे यारों, 
हम है इन्सां 
इन्सां ही रहेंगे यारों,
 


          *******राघव विवेक पंडित




Monday, 2 July 2012


माँ ने
आँखों में आंसू भर
बेटे को 
शहर के लिए
विदा तो किया,

लेकिन आज भी
माँ की आँखों मे
विदाई के समय की
नमी बाकी है

आज भी
घर के द्वार के
उसी कोने पर
शाम को
उसके आने का
करती है इंतज़ार,
जहां से उसने
अपने बेटे को
जी भर देख
विदा करने का
साहस किया था,


     *******राघव विवेक पंडित


रुठुं तो किससे
कोई अपना सा 
लगा ही नहीं 
किसी न 
अपना कहा ही नहीं,

जो मिला स्वार्थ से
स्वार्थ पूर्ण होते ही
वो हो गया विलुप्त,
जैसे संसार से
डायनासौर,

लेकिन ये लौटेगा फिर
किसी स्वार्थ से
मिन्नते करता
माफ़ी मांगता
और स्वार्थ पूर्ति
के पश्चात
फिर गायब,

और बढ़ा गया
मेरे जीवन में एक और
स्वार्थी मित्र की संख्या,

******राघव विवेक पं
डित
बचपन से ही 
स्वयं के सिवाय 
सबके लिए 
सोचता था वो,

माँ बाप घर द्वार
कब छूटे
उसे नहीं पता
उसे पता था सिर्फ
गाँव के लोगों की समस्या और
उनके दुःख दर्द,
गाँव के सभी लोगों के
दिल में
रहता था वो,
गाँव के बहुत से लोग
उसका नाम तक नहीं जानते थे,
गाँव के बड़े बुगुर्ग उसे
बेटा
और गाँव के बच्चे
भैया
कह बुलाते थे,

एक बार कहीं
दूर गाँव में
तूफान से
सारा गाँव बिखर गया
बर्बाद हो गए लोग
चारों ओर हा हाकर,

उसने सुना
बिना कुछ सोचे विचारे
वो आतुर हो उठा
वहां जाने को,
गाँव वालों ने
उसे बहुत मना किया
पर वो अपने निर्णय पर
अडिग रहा,
लोगों ने उसे भारी मन से
विदा किया,

किसी ने बताया
उसने वहां भी
पीड़ितों की बहुत
सेवा की,
वहां भी न जनता था
उसका कोई नाम,

वहां भी लोगों में उनका
बेटा और भैया
बन के रहा वो,
बहुत समय तक
उसकी फिर
कोई खबर न आई,

फिर एक दिन
खबर आई कि
बाढ़ के पानी में
डूबते एक बच्चे को बचाते समय
वो स्वयं भी डूब गया,

लौटा न वो
फिर कभी
वो मिटाता चला
अपने क़दमों के निशाँ
नहीं चाहता था वो
अपनी कुबानी के बदले
कुछ भी,.

लेकिन वो
छोड़ गया लोगों के
ह्रदय में एक अमिट छाप,

*******राघव विवेक पंडित
क्यों कोई आता है याद,
कुछ मरहमी 
बातें करने के बाद,

क्यों उसकी की कमी सी 
महसूस होती है,
उसे देखने की बार बार
ख्वाइश होती है,

वो अनजाना
अनदेखा
अपना सा लगने लगता है,
उसका अपनापन
मजबूर कर देता है
आँखों में आंसू होने
के बाद भी
मुश्कुराने को,

जब भी कोई दिल को
ठेस पहुंचता है
बहुत याद आती है उसकी,
दिल चाहकर भी
उसे भुला नहीं पाता,

*******राघव विवेक पंडित

क्यों खुमारी सी
तुझ पे 
मजहब की
छाई रहती है, 
क्यों तुझे
इंसानियत की बात 
न सुनाई देती है, 
क्यों उलझी
रहती है तू 
हजारों साल पुरानी किताबों में,
उनमे कहाँ 
आज की
तस्वीर दिखाई देती है,

बचपन से ही
तुने निर्दोष
जीव और इंसानों का
खून बहते देखा है,
तू कितना भी धोये 
मैंने आज भी
तेरी बातों और हाथों में 
लहू देखा है,

कितना भी मुहब्बत का 
नाम तेरी
जुबान पे सही,
बगल में तेरे सदा
लहू सना
खंजर रहता है,

तू कितना भी
खुद को
समाज में फैली 
बुराइयों का
आलोचक कह,
तेरी बातों में
कहीं न कहीं 
मजहब प्रेम रहता है,

          ********राघव विवेक पंडित 

क्यों भाग रहा है  
पता नहीं,
अनगिनित चीख और चिलाहट
सुनने के बाद भी
नहीं जाग रहा है, 
अँधा हो गया है,
स्वार्थ में 
बहरा हो गया, 
लालच में 
खबर नहीं
खुद की भी 
ठोकर लगने पर गिरता है
फिर संभलता है, 

फिर लगा भागने 
पर किस ओर
मालूम नहीं,

ह्रदय है खाली
सिर्फ एक
मांस का टुकड़ा,
कब संवेदनाओं ने
दम तोडा 
पता नहीं,
कब इंसान से मशीन बना
पता नहीं  
बन गया है,
चलता फिरता मांस का टुकड़ा
बस चलता जा रहा है ... चलता जा रहा है 
कहाँ 
पता नहीं ...........
आज का इंसान, 

          *******राघव विवेक पंडित