Thursday, 3 May 2012


एक भ्रष्ट नेता की जीत
शहर की सड़कों पर
ख़ुशी मनाते
उसी की तरह के
भ्रष्ट और चापलूस लोग,
हरामखोर और आवारागर्द
लोगों की सड़क पर भीड़,
भ्रष्ट नेता के पीछे
जय जयकार करता
फूलमाला पहनाता
अपराधियों का समूह,

भीड़ से कुछ
दुरी पर खड़े कुछ
हाथ मलते
अपने गुस्से को दबाते
पथराई आँखों से देखते
मजबूर और लाचार लोग,
अपने नसीब को कोसते
और सोचते
फिर सहने पड़ेंगे इनके जुल्म
फिर अभिशाप बन जायेगी
बहन बेटियों की सुन्दरता,
फिर खाया जाएगा
हमारी बदहाली मिटाने के
नाम पर पैसा,

शायद हमारी किस्मत में ही
इनके अत्याचारों से घुट घुट के
जीना और मरना है,
जाने कब खत्म होगी इन
अत्याचारी और कुशाशित
नेताओं की भीड़,

जाने कब तक पालते रहेंगे
नपुंशक बन हम
इन पिशाचों को,

*******राघव विवेक पंडित
कब तक यु ही बेकरार दिल संभालूं
कोई हमनशी मिले तो दिल लगा लूं

जो कोई दे दे तडपते दिल को राहत
उसे यूँ तड़पने का सबब बता दूँ,

जो कोई दे मुहब्बत, मुझ दीवाने को
उसी पे दिल की दौलत मैं लुटा दूँ,

जो कोई दे दे अपना हाथ मेरे हाथों में
उसी को मैं अपना हमसफ़र बना लूँ ,

*******राघव विवेक पंडित


फूलों में तुम बहारों में तुम,
फलक पे चमकते सितारों में तुम

सांसो में तुम, धडकनों में तुम,
निगाहों में तुम, नजारों में तुम,

ख्वाब भी तुम, हकीकत भी तुम,
वादों में तुम, इरादों में तुम,

दर्द भी तुम, मरहम भी तुम,
जिन्दगी भी तुम, जन्नत भी तुम,

*******राघव विवेक पंडित



छोटी सी नन्ही परी
छोटे छोटे सपने
हाथों में गुडिया
ख्यालों में अपने
निश्चल, निष्कपट
मासूम सी करती है
मीठी मीठी बातें,

सबकी प्यारी
सबसे न्यारी
इस घर की
वो राजकुमारी,
दादा दादी. नाना नानी
इनके दिल की
वो है महारानी,

सबके मन को भावें वो
सबको प्यार से बांधे वो,
पापा जब
दफ्तर से आते
खाना उन्हें खिलाती वो,

पहले पूछती
गुस्सा तो नहीं करोगे
फिर दिन में की सभी
शरारतें
पापा को बतलाती वो,

मम्मी की मदद की कोशिश में
सारे काम बिगाड़े वो
जब मम्मी डाटन को आये
पापा को शिकायत लगाए वो,

सबकी आँखों सकूँ वो
उसके नन्हे क़दमों से
रोशन रहता
मेरा घर मेरा संसार,

*******राघव विवेक पंडित

मेरा हर लफ्ज दर्द में डूब जाएगा
राहत ऐ गम तेरा जो साथ छुट जाएगा,

मेरा हर अश्क आँखों से गिरने को तडपेगा
दिल तरसेगा रोने को, पर रोया भी न जाएगा,

तुम करोगी अपना आबाद नया गुलिस्तान
और मेरा जर्द गुलिस्तान भी न रह जाएगा,

तुम न करोगी याद कभी भूलकर भी
मेरा दिल तुम्हे चाहकर भी न भूल पायेगा,


*******राघव विवेक पंडित
खामोश जुबां
मदहोश शमां
निगाहों से
मुहब्बत का जाम पिया
मदहोशी कुछ तुम पर छाई
कुछ मैं भी मदहोश हुआ
कुछ डूबी तुम मुझमे
कुछ में भी तुम में डूब गया
कुछ तुम में
सावन झूम गया
कुछ में भी
तड़प के बरस गया,

*******राघव विवेक पंडित

बट गया 

जमीं बट गई
आसमान बट गया
मुहब्बत भरा
ये जहान बट गया,

शहर बट गया गाँव बट गया
घर का एक एक 
समान बट गया,

माँ बट गई बाप बट गया
माँ बाप के सपनो का 
जहान बट गया,

कभी खेले थे जिस आँगन में
नीम तले भाई बहन 
उस आँगन की ईंट ईंट 
नीम का पत्ता पत्ता
और आसमान बट गया,
 
बेटी बट गई बेटा बट गया 
बेटी की चाहत का 
खुमार घट गया,

बट गया शहर 
ये जहान बट गया 
सितारों भरा ये आसमान बट गया
इंसानों में इंसानियत का   
भाव घट गया
इंसान बट गया 
भगवान बट गया, 


           *******राघव विवेक पंडित