Wednesday, 1 February 2012

चांदनी रात

बरसों बाद चांदनी रात आई है,

बरसों जिन्दगी सियाह रातों में बिताई है,



था कोई जो दे गया था अँधेरा हमको,

उसकी दी हर चीज़ हमने दिल से लगाईं है,



क्या बदनसीबी है,

चांदनी रात में ही हमको मौत आई है,

हमें कब जीते जी चांदनी रात रास आई है,



चांदनी रात भी पलभर की सौदाई है,

दफ़न के बाद, फिर अँधेरा, उसकी यादें और तन्हाई है,





*********राघव पंडित***

जिन्दगी

जिन्दगी आज तुझ से कुछ बात कर लूं,

तेरे साथ बिताये कुछ लम्हों को याद कर लूँ,



जब तू आई मैं रो रहा था

माँ प्रसव की वेदना को भूल मुझे देख

बहुत खुश हो रही थी,मुझे देख सेकड़ो

सपने संजों रही थी,



थोडा बड़ा हुआ बचपन आया

हर लम्हे से मैंने एक सपना सजाया,

जो अब न कर सका वो बड़ा होकर करूँगा

अपनी माँ के हर सपने को साकार करूँगा,



जवानी आते आते,ये कैसा दौर आ गया,

मेरे देखे सपनो को, सूखे पत्तों सा उड़ा गया,

सपने देखना तो गुनाह हो गया,

हर एक इंसान खुदा हो गया,

इंसानों में इंसानियत ख़त्म हो गई,

माँ ने जो सिखाई थी ईमान,धर्म की बातें

वो कहाँ खो गई,



जिन्दगी तुने मेरा हर पल साथ दिया,

मैं ही खुदगर्ज़ और लालची था

जो तुझे भुला दिया,



जिन्दगी तू बहुत खुबसूरत है,

तुने मुझे जीने की लिए सब कुछ दिया,

मैं इंसान ही तेरे काबिल नहीं,

मैं ही तेरे दुःख सुख में शामिल नहीं,







**********राघव पंडित***

खुदगर्ज़

मैं खुदगर्ज़ अपने को कहूँ या खुदा को,

जिसने मुझे बनया मेरी वफ़ा को,

उसकी इबादत ही, मेरी वफ़ा है,

न करूँ इबादत,

तो वो मुझसे खफा है,



हर एक रिश्ता खुदगर्जी से भरा है,

इंसान का वजूद ही

खुदगर्जी से खड़ा है,



हर इंसान को

किसी न किसी से उम्मीद है

भगवान को भक्त से,

माँ बाप को संतान से,

पति को पत्नी से,

मालिक को नौकर से,

कवि को श्रोता से,



इंसान गली के कुत्ते को कुछ खाना देते हुए

ये सोचता है,ये मेरे घर की रखवाली करेगा,



जब खुदा ही खुदगर्ज़ है तो

उसकी खुदाई का क्या कसूर,

बाप के लहू का असर,

औलाद के लहू में होता है

कुछ न कुछ जरूर,





*********राघव पंडित***

गद्दारों का राज

गद्दारों का राज



संतों की धरती पर, राक्षसों का डेरा है,

गद्दारों के घरों पर,

देशभक्तों का पहरा है,



हर तरफ कलयुग की घटा छा रही है,

ये देख सतयुग की

छाती फटी जा रही है,



झूठे और बेईमानो का

हर ओर बोल बाला है,

सच्चे और ईमानदार को,

घर से झूठा कह निकला है,



नेताओं की नगरी है,

कहाँ वो किसी से डरता है,

देश सेवा के नाम पर

अपना घर भरता है,



इमानदारों की गैरत

कोडियों के भाव बिकती है,

बेईमानों की बेईमानी भी

इमानदारी सी दिखती है,



नजरिया बदल गया है

हर एक इंसान का,

चोरों का रास्ता भी,

अब तो लगता है ईमान का,



खुनी और गद्दारों की जेलों में

सेवा होती है,

देशभक्त शहीदों की माँ

पेंशन के लिए रोती है,



कल जिनको हमने अपना समझ

अपने घर में शरण दी,

उन्होंने ही आज हमारे

विश्वास और बच्चों की गर्दन कलम की,



देश में झूठे और मक्कारों के हाथ सत्ता,

और गद्दारों की भरमार है,

मेरे देश का हर एक

सच्चा देशप्रेमी,

बेबस और लाचार है,



अब अन्ना भी लायें है

सुधार के लिए लोकपाल की तलवार,

अब धीरे धीरे हो गए है

उनके साथ भी गद्दार,

अब देखते है तलवार क्या रंग दिखाती है,

या गद्दारों की टोली,

तलवार को ही खा जाती है,





***********राघव पंडित***

ये दूरी

मेरे कदम तुम्हारी ओर बढ़ने से पहले कई बार सोचते है,

मैं कुछ भी कहने से पहले कई बार सोचता हु,

क्योकि अब तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं है,



एक समय था तुम मेरे साथ ज्यादा ज्यादा

समय बिताना चाहती थी,

एक समय वो था जब रोज़ शाम को

तुम मेरे आने का बेसब्री से

इंतज़ार करती थी,





आज वो समय है कि तुम

अपनी प्रसंसा करने वालों के

बीच घिरे रहना चाहती हो,

उनके द्वारा तुम्हारी प्रसंसा में कहे गए

शब्दों में खोई रहती हो,

मैं चाहकर भी तुमसे

अपने मन की बात नहीं पाता,





तुम और मैं आज एक साथ रहते हुए भी

एक साथ नही है,

तुम्हारे और मेरे बीच की दूरी,

जो दो कदम है

वो आज सौ कदम हो गई है,

मैं आज एक मूक दर्शक सा,

सिर्फ तुम्हारे चहरे पर आने वाले

भावों को देख सकता हु,

वो भाव जब बदलते है जब तुम्हे

अपने किसी प्रसंसक के द्वारा कहे

शब्द याद आते है,



मैं भी बहुत खुश होता हूँ

तुम्हे खुश देखकर,

लेकिन मैं डरता हूँ कि कहीं

ये दूरी इतनी न बढ़ जाये,

कि ये हमारा पवित्र रिश्ता,

एक समझोता बन के न रह जाये,



जीवन में कुछ पाने के लिए

संघर्ष करना प्रसंसनिये है,

जीवन में कुछ पाने के लिए

सब कुछ भूल जाना मुर्खता है,





  ******RAGHAV  PANDIT 


जिज्ञासा

ये कैसी जिज्ञासा है कुछ पाने की अभिलाषा है,

सब कुछ पाने के बाद भी

कुछ कमी महसूस होती है,

न जाने क्यों कभी कभी,

जोर जोर से रोने की इच्छा सी होती है,



रात दिन ये दौड़ धुप किस लिए कर रहा हूँ

ये सोच के परेशान सा हो जाता हूँ,



जब एक रुपया कमाता था

खुश रहता था

दाल रोटी खाता था और

चैन से सो जाता था,



अब सौ रुपया कमाता हूँ,

अब दाल रोटी खाने के लिए

समय का आभाव है,

और अब मेरे साथ बेचैनी और

मानसिक तनाव है,



मेरे अन्तर्मन ने मुझसे कहा,

तेरी जिज्ञासा जिसे पाने की है

वो है संतोष,

तुने खो दिए,

अपने अनंत लालच में होश,



अभिलाषाएं तो है अनंत,

जो कभी पूर्ण नहीं होती है,

लेकिन संतोष है वो

जिसमे सुखी जीवन की कुंजी छिपी होती है,





*********राघव पंडित**


तलाश

तलाश तलाश तलाश

ये कैसी तलाश है,

किसी को नौकरी की,

किसी को रोटी की,

किसी को प्यार की,

किसी को यार की,

कोई जीवन के लिए रोता है,

तो कोई मौत को

तलाश करता है,





इस तलाश का

एक ही जवाब है,

समय से पूर्व

अपनी हर इच्छा पूर्ण करना,

हर आदमी का ख्वाब है,



ये कर्म क्षेत्र है,

यहाँ तेरे कर्म और

प्रभु कीकृपा से सब मिलता है,



जो प्रभु और अपनी मेहनत

पर विस्वास करता है

संसार के सभी

सुख उसे तलाश करते है,





*******राघव पंडित**