Wednesday, 1 February 2012

mera kasoor

मैं कैसा इंसान हूँ,

सच बोलने का कसूरवार हूँ,

बचपन से

सच बोलते बोलते मैं थक गया,

जब भी बोला

सच हल्ला सा मच गया



विद्यालय मैं शिक्षक ने पढाया

सदा सच बोलो,

सच बोलना

तो वो सिखाता था,

लेकिन शिक्षक भी

सच बोलने से कतराता था,

वो भी विद्यालय के संरक्षकों की

झूठी प्रंशंसा करता था,

और अपने बच्चों का पेट भरता था,

शिक्षक को ज्ञान था ये कलयुग है,



झूठे और मक्कारों का

हर ओर बोल-बाला है,

सच और सच्चा

तो सिर्फ किताबों में ही रहता है,



झूठे और मक्कारों के

हाथ में मेरे देश की बागडोर है,

हर तरफ इनके

कारनामों का शोर है,



लेकिन इन सबको देखने के बाद भी

सच बोलने की प्रबल इच्छा होती है,

अगर झूठ बोलता हूँ तो

मेरी अंतरात्मा रोती है,



हे ईश्वर,

अब तू ही बता,

क्या कभी सच का दौर भी आएगा

या सच

यू ही घुट घुट के मर जायेगा,





*******राघव पंडित***

पल पल मुझसे

पल पल जिन्दगी

दामन छुड़ाती रही,

तुम पल पल

सपने सजाती रही,



मैं तिल तिल पल पल

मरता रहा,

तुम पल पल

मुझे निगाहों से गिराती रही,



मैं आँखों में मौत लिए

तुम्हे पल पल

याद करता रहा,

तुम पल पल

बंद पलकों में मुझे भुलाती रही,



मैं पल पल

तुम्हे देख जीता रहा,

तुम पल पल

मेरे मरने की दुआ करती रही,



मेरा पल पल

जनाजा घर से रुखसत होने लगा,

तुम पल पल

सुनहरे ख्वाबों में खोने लगी,



मुझे पल पल

खाक ने,

खाक बना दिया,

तुमने पल पल

मुझे अपने दिल और खवाबों से मिटा दिया



*********राघव पंडित**

मेरी दीवानगी

हम तेरी बेरुखी को भी

प्यार की एक शक्ल कहते है,

क्योकि हम

तेरी नाराजगी को भी प्यार कहते है,


तेरी निगाहों में

हमें वफ़ा की तस्वीर दिखती है,

जाने क्यों

फिर भी तू हमसे खफा खफा सी दिखती है,


तेरी निगाहों में भी

अजब जादू है ओ यारा,

नाराज नज़रों में लगे है

तू और भी प्यारा,



तेरे होठों में

गजब कशिश है ओ यारा,

तुझे जो देख ले

वो भूल जाये ये जहाँ सारा,


गजब खुशबु है

तेरे जिस्म की जो मेरी सांसों में लिपटी है,

तू है न जाने क्यों,

मेरे वजूद से छिपती है,


तुझे देखकर न जाने

क्यों सुलग उठती है मेरी साँसे,

तेरे ख्वाब भी जला जाते है,

मेरा दिल मेरी रातें,



*******राघव पंडित**

संघर्ष

हमने रेगिस्तान में परिंदों को

प्यास बुझाते देखा है


हमने आँधियों से पेड़ों को

अपने वजूद के लड़ते देखा है,


हमने टूटे हुए

दिलों को मुश्कुराते देखा है,



हमने इंसानों को अकाल में भी

जीवन के लिए संघर्ष करते देखा है,



हमने अनाथ बच्चों को रोटी के लिए

कड़ी धुप में मेहनत करते देखा है,



हमने एक मजबूर औरत को

अपने बच्चों का पेट भरने के लिए

दूसरों के घरों में काम करते भी देखा है,



संघर्ष ही जीवन है संघर्ष समाप्त जीवन लीला समाप्त,

जो जीवन संघर्ष करने के लिए सदेव तत्पर रहता है,

वो कभी नहीं हारता है,

संसार के हर प्राणी को जीने के

लिए किसी न किसी रूप में संघर्ष करना ही पड़ता है,



*********राघव पंडित***

जय माँ भारती

बहुत पीड़ा हो रही है

माँ भारती मेरी रो रही है ,

मेरे लालों ने मेरा क्या हाल कर दिया

जिन लोंगों पर मेरे बच्चों को रहम आया,

उन्होंने ही मेरे बच्चों का क़त्ल कर दिया,



मेरे बच्चों ने मुझे लूटनेवालों को

पहले रहने के लिए मेरा एक भू भाग दिया

जो लुटेरे मेरे घर में बचे रह गए

उन्हें यहाँ रहने का हक़ दिया

फिर सत्ता में भागीदारी दी,



इतना सब कुछ करने के बाद भी,

मेरे बच्चों को क्या मिला

खून खराबा

दहशत

गद्दारी

बम से चीथड़े चीथड़े हुई

अपने मासूम बच्चों की लाशें,

इतना सब सहने के बाद भी

मेरी भारत माँ के लाल कितने मजबूर है,

चाहे अपने बच्चों को रोटी न मिले,

लेकिन कसाब,गिलानी और सलेम

जैसे खुनी और लुटेरों को,

मटर पनीर और मांस खिलते जरूर है,



मेरी भारत माँ

कब तक यूही रोती रहेगी,

उसकी संतान

कब तक सेकड़ों मजबूरियों का नाम लेकर

इन कातिलों को ढोती रहेगी,



नेता कब तक वोटो के लालच मे

इन्हें बाप बनायेंगे



कब तक अपने भाइयों की लाशों के

बदले में सत्ता पाएंगे,



ये अशोका द ग्रेट नहीं है

जो लाशों का ढेर देख बदल जायेंगे



ये सेकड़ों को मारेंगे और

हजारों को मारने की कसम खायेंगे,



माँ भारती की अपने बच्चों से

अब एक ही गुहार है

मिटा दो हर उस कातिल को

मेरे दामन से,

जो गुनाहगार है,





*********राघव पंडित***

पश्चाताप के आंसू

आंसूओं को पलकों पर आने से रोक ले,

न जाने कोई इन्हें देख क्या सोच ले,

ये अपने साथ सेकड़ों सवाल ले आयंगे,

तू चाहकर भी

किसी सवाल का जवाब न दे पायेगा,

क्या है इसका कारण ये कैसे बताएगा,



कैसे बताएगा की

मैं अपने माँ बाप के साथ न्याय न कर सका,

ये उसके पश्चाताप के है,



कैसे बताएगा की

मैं अपने बच्चों को समय पर शिक्षा और

खाने को रोटी न दे सका,

ये उसके पश्चाताप के है,



कैसे बताएगा की

मैंने अपनी पत्नी को अकेला छोड़ दिया था,

जब उसे मेरी बहुत जरूरत थी,

ये उसके पश्चाताप के है,



कैसे बताएगा की

जब मेरी मार्त्भूमि, मेरे

भाई बंधुओं पर अत्याचार हो रहे थे,

उस समय मैं कायरों की भाँती

अपनी जान बचाकर भाग गया था,

ये उसके पश्चाताप के है,



कैसे बताएगा की सत्ताधारी राजनेता,

जब देश की जनता को दोनों हाथों से

लुट लुटकर अपना घर भर रहे थे

तब मैं उनके भाषण पर ताली बजा रहा था,

ये उसके पश्चाताप के है,



कर ले तू आज निश्चय

कि तू कुछ ऐसा कर जायेगा

तेरे बहते

आसुओं का कारण जमाना बताएगा,



तेरे बहते

आसुओं का कारण बताते तुझे शर्म न आएगी,

तेरी माँ भी भगत सिंह और चंदर शेखर आज़ाद की

माँ की तरह,

शहीद की माँ कहलाएगी,



**********राघव पंडित***

उम्मीद

ठिठुरती ठण्ड में 
सुबह सुबह
मासूम सी
दो आँखें
रेड लाइट पर
रुकी गाड़ियों की
ओर
आगे बढती है
फिर रुक जाती है
.
आगे बढती है
फिर रुक जाती है

इस उम्मीद से
शायद गाडीवाला कुछ देगा
बहुत जोर से लगी
भूख मिटाने को खाना
या खाना खरीदने को
पैसा

कुछ देगा या नहीं
इसी असंजमस के हालात में
वो आगे नहीं बढ़ता
और ग्रीन लाइट हो जाती है
गाडी चली जाती है

ठिठुरती ठण्ड में
दो आँखें
फिर किसी गाडी के
इंतज़ार में

******* राघव विवेक ***