Wednesday, 21 March 2012

स्त्री


ह्रदय 
इतना कोमल जैसे 
पंखुड़ी गुलाब की,
 
आँचल 
इतना विशाल 
जिसमे है संसार के 
सभी जीवों और प्राणियों 
के लिए ममता,
सहनशक्ति 
धरा सी
सेकड़ों वर्षों से 
समाज के विभिन्न प्रकार के 
सेकड़ों प्रहारों को  
झेलती 
लेकिन अडिग 
अपने ममता रूपी
आचरण के साथ,

अपने बच्चों की
रक्षा के लिए जो रूप धरे
दुर्गा का,

अपनी धरती माँ की
रक्षा के लिए जो रूप धरे
वीरांगना लक्ष्मीबाई का,

समाज ने जिसे 
शोषण के साथ साथ दिए 
विभिन्न रूप और नाम
लेकिन किसी भी  
रूप और नाम में 
उसने न खोई अपनी पहचान 
ममतामयी की,

न विचलित कर सका 
समाज का बड़े से बड़ा 
प्रहार,
जितने जुल्म 
उस पर बढ़ते गए, 
उसकी सहनशक्ति भी
उतनी बढती गई,

उसकी हिम्मत 
पर्वत सी,
उसकी शक्ति असीमित,
जननी मानवीय शक्ति की, 

हम उसे किसी रूप में भी बांधे 
चाहे कहे माँ
बहन 
बेटी
पत्नी 
हर रूप में अपूर्ण है उसकी व्यख्या,
वो है धरा सी व्यख्या विहीन,


        *******राघव विवेक पंडित  



2 comments:

  1. बहुत सुन्दर...
    सार्थक रचना..

    बधाई!!!

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  2. आप का तहेदिल से शुक्रिया........

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